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लांसेट की चेतावनी: 12 साल से कम उम्र में स्मार्टफोन बना रहा बच्चों को मानसिक रोगी, 2030 तक गहराएगा संकट

Thursday, 16 April 2026 | April 16, 2026 IST Last Updated 2026-04-15T20:21:02Z


नई दिल्ली: बदलती डिजिटल जीवनशैली बच्चों के बचपन को किस तरह प्रभावित कर रही है, इसका खुलासा 'लांसेट कमीशन ऑन एडोलसेंट हेल्थ' की हालिया रिपोर्ट में हुआ है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि बच्चों की स्क्रीन आदतें और जीवनशैली नहीं बदली गई, तो साल 2030 तक दुनिया भर में किशोरों का स्वास्थ्य एक भयावह स्थिति में पहुँच जाएगा।

स्मार्टफोन और मानसिक स्वास्थ्य का सीधा संबंध

रिपोर्ट में सबसे चौंकाने वाला तथ्य स्मार्टफोन की उम्र को लेकर आया है:

  • डिप्रेशन का खतरा: 12 साल की उम्र से पहले स्मार्टफोन का उपयोग बच्चों में अवसाद (Depression) और चिंता (Anxiety) के लक्षणों को तेजी से बढ़ा रहा है।

  • नींद और विकास: मोबाइल के अत्यधिक उपयोग से बच्चों की नींद की गुणवत्ता खराब हो रही है, जिससे उनके मस्तिष्क का प्राकृतिक विकास बाधित हो रहा है।

  • मोटापे का जाल: फिजिकल एक्टिविटी की कमी और स्क्रीन के सामने घंटों बैठने से 2030 तक करीब 46 करोड़ युवा मोटापे का शिकार हो सकते हैं, जिससे भविष्य में टाइप-2 डायबिटीज और हृदय रोगों का खतरा बढ़ जाएगा।


साइबर बुलिंग और सुरक्षा के नए खतरे

डिजिटल दुनिया ने बच्चों को केवल शारीरिक रूप से ही नहीं, बल्कि सामाजिक रूप से भी असुरक्षित बनाया है:

  1. साइबर बुलिंग: सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेमिंग के जरिए बच्चों को मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है, जिससे उनमें भय और आत्महीनता की भावना पैदा हो रही है।

  2. दुर्घटनाएं: रिपोर्ट के अनुसार, 10 से 24 वर्ष की आयु के युवाओं में मृत्यु का एक प्रमुख कारण आज भी सुरक्षा संबंधी असावधानियां और दुर्घटनाएं हैं।


भविष्य का संकट: एक अरब किशोरों पर खतरा

यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन और यूनिवर्सिटी ऑफ मेलबर्न जैसे संस्थानों के सहयोग से तैयार इस रिपोर्ट का अनुमान है कि 2030 तक एक अरब से अधिक किशोर ऐसी परिस्थितियों में होंगे जहाँ मानसिक विकार उनके जीवन के कीमती वर्षों को नष्ट कर देंगे।


माता-पिता के लिए सुरक्षा कवच: क्या करें?

विशेषज्ञों ने इस संकट से निपटने के लिए कुछ सुझाव दिए हैं:

  • संवाद बढ़ाएं: बच्चों से उनकी ऑनलाइन गतिविधियों और मानसिक स्थिति के बारे में नियमित बात करें।

  • व्यवहार पर नजर: यदि बच्चा चिड़चिड़ा हो रहा है, गुमसुम रहता है या खाने की आदतों में बदलाव आया है, तो इसे गंभीरता से लें।

  • स्क्रीन टाइम पर लगाम: बच्चों का स्क्रीन समय कम करें और उन्हें मैदान में खेलने या अन्य शारीरिक गतिविधियों के लिए प्रोत्साहित करें।

यह रिपोर्ट केवल आंकड़े नहीं, बल्कि एक स्पष्ट संकेत है कि डिजिटल उपकरणों की पहुँच बच्चों तक सीमित करना अब विकल्प नहीं, बल्कि जरूरत बन गया है। बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य और उनकी सुरक्षा हमारी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।

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