नई दिल्ली: संसद के आगामी विशेष सत्र से पहले महिला आरक्षण के मुद्दे पर सियासत गर्मा गई है। कांग्रेस ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि चुनावी माहौल के बीच विशेष सत्र बुलाना केवल 'श्रेय लेने की कोशिश' है। पार्टी का मानना है कि इस कदम के जरिए सरकार क्षेत्रीय संकटों और अन्य ज्वलंत मुद्दों से ध्यान भटकाना चाहती है।
"संविधान संशोधन पहले ही हो चुका है": जयराम रमेश
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने स्पष्ट किया कि महिला आरक्षण (33 प्रतिशत) से संबंधित संवैधानिक प्रावधान (अनुच्छेद 334 ए) सितंबर 2023 में ही सर्वसम्मति से पारित किया जा चुका है। ऐसे में नए सिरे से विशेष सत्र बुलाने के पीछे सरकार के गुप्त एजेंडे की आशंका जताई गई है।
कांग्रेस की मुख्य चिंताएं:
- परिसीमन का आधार: पार्टी को अंदेशा है कि सरकार बिना नई जनगणना के परिसीमन (Delimitation) प्रक्रिया शुरू करना चाहती है।
- छोटे राज्यों को नुकसान: कांग्रेस का तर्क है कि अनधिकृत आंकड़ों के आधार पर होने वाला परिसीमन दक्षिण भारत और अन्य छोटे राज्यों के प्रतिनिधित्व को कमजोर कर सकता है।
- विपक्ष की अनदेखी: पार्टी ने दावा किया कि राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे द्वारा लिखे गए पत्रों के बावजूद सरकार ने सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग को अनसुना कर दिया।
कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) की बैठक में बनी रणनीति
शुक्रवार को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की अध्यक्षता में मुख्यालय पर एक उच्चस्तरीय बैठक हुई, जिसमें राहुल गांधी और तीन राज्यों (कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश, तेलंगाना) के मुख्यमंत्री भी शामिल हुए।
- राहुल गांधी का संदेश: बैठक के बाद राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर साझा किया कि कांग्रेस महिला सशक्तीकरण और सामाजिक न्याय के प्रति सदैव प्रतिबद्ध रही है।
- संयुक्त विपक्ष की बैठक: जयराम रमेश ने जानकारी दी कि सरकार की नीतियों के विरुद्ध ठोस रणनीति बनाने के लिए अगले सप्ताह विपक्ष के प्रमुख नेताओं की एक संयुक्त बैठक बुलाई गई है।
- पारदर्शिता का अभाव: विपक्ष का आरोप है कि सरकार ने अभी तक औपचारिक रूप से यह साझा नहीं किया है कि वह संविधान में कौन-से विशिष्ट संशोधन लाना चाहती है।
पश्चिम एशिया संकट और चुनावी गणित
कांग्रेस ने तंज कसते हुए कहा कि सरकार अंतरराष्ट्रीय चुनौतियों (पश्चिम एशिया संकट) से जनता का ध्यान हटाने के लिए महिला आरक्षण को ढाल बना रही है। पार्टी के अनुसार, पांच राज्यों के चुनावों के बीच इस तरह का सत्र बुलाना केवल राजनीतिक लाभ लेने का जरिया है।

