नई दिल्ली: भारतीय जनता पार्टी के 'कोर एजेंडे' में शामिल समान नागरिक संहिता (UCC) अब केवल एक चुनावी वादा नहीं, बल्कि पार्टी की राष्ट्रीय रणनीति का केंद्र बन चुका है। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के लिए भाजपा ने सत्ता में आने पर UCC लागू करने का संकल्प लिया है। असम के बाद बंगाल दूसरा ऐसा राज्य है जहाँ पार्टी ने इसे प्रमुखता से अपने घोषणापत्र में जगह दी है।
'सेक्युलर सिविल कोड' की नई परिभाषा
हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने UCC को 'सेक्युलर सिविल कोड' के रूप में परिभाषित किया है। सरकार का तर्क है कि इसका उद्देश्य कानूनी भेदभाव को समाप्त करना और संविधान के अनुच्छेद 44 की मूल भावना को धरातल पर उतारना है। राम मंदिर निर्माण और अनुच्छेद 370 के खात्मे के बाद, अब UCC ही भाजपा का वह आखिरी बड़ा वादा है जिसे राष्ट्रीय स्तर पर लागू किया जाना शेष है।
ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: 1980 से अब तक का उतार-चढ़ाव
- UCC का मुद्दा भाजपा के राजनीतिक सफर के साथ-साथ विकसित हुआ है:
- शुरुआती दौर (1980-90): जनसंघ के जमाने से ही यह मुद्दा चर्चा में था। 1996 के चुनाव घोषणापत्र में इसे स्पष्ट रूप से शामिल किया गया।
- गठबंधन की विवशता (1998-99): अटल बिहारी वाजपेयी के दौर में NDA के क्षेत्रीय दलों की असहमति के कारण भाजपा को रणनीतिक रूप से इस मुद्दे को ठंडे बस्ते में डालना पड़ा था।
- बहुमत का युग (2014-2024): केंद्र में पूर्ण बहुमत मिलने के बाद 2014, 2019 और 2024 के संकल्प पत्रों में UCC को प्रमुखता दी गई।
राज्यों के जरिए राष्ट्रीय लक्ष्य की ओर
वर्तमान में केंद्र में गठबंधन सरकार (TDP और JDU के साथ) होने के कारण राष्ट्रीय स्तर पर आम सहमति बनाना एक चुनौती है। ऐसे में भाजपा ने एक 'नया मॉडल' अपनाया है:
- उत्तराखंड मॉडल: उत्तराखंड देश का पहला राज्य बना जिसने UCC को कानूनी रूप दिया। अब इसे अन्य राज्यों के लिए एक बेंचमार्क माना जा रहा है।
- राज्य-स्तरीय विस्तार: गुजरात, मध्य प्रदेश और असम जैसे भाजपा शासित राज्य अब इसी दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। उत्तर प्रदेश में भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसके संकेत दिए हैं।
- रणनीतिक बढ़त: राज्यों में इसे लागू कर भाजपा धीरे-धीरे पूरे देश में इसके लिए जमीन तैयार कर रही है, ताकि भविष्य में इसे राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने में कानूनी या सामाजिक बाधाएं कम हों।
गठबंधन सहयोगियों का रुख
भले ही भाजपा राज्यों में आक्रामक है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर तेलुगु देशम पार्टी (TDP) और जनता दल (यूनाइटेड) जैसे सहयोगी दल इस पर व्यापक विमर्श और सभी समुदायों को विश्वास में लेने की बात कह रहे हैं। यही कारण है कि केंद्र सरकार फिलहाल इस पर फूंक-फूंक कर कदम रख रही है।

