नई दिल्ली: भारतीय लोकतंत्र के आधार स्तंभ 'संविधान' को जन-जन तक पहुँचाने की दिशा में एक और ऐतिहासिक कदम उठाया गया है। उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने शुक्रवार को उपराष्ट्रपति भवन में सिंधी भाषा में संविधान का नवीनतम संस्करण विमोचित किया।
देवनागरी और फारसी लिपियों का संगम
यह नया संस्करण विशेष रूप से सिंधी भाषी लोगों की सुविधा को देखते हुए दो प्रमुख लिपियों में प्रकाशित किया गया है:
- देवनागरी लिपि
- फारसी (Persian) लिपि
विमोचन के दौरान उपराष्ट्रपति ने कहा कि आजादी के बाद पहली बार सिंधी भाषा (विशेषकर देवनागरी लिपि) में संविधान का प्रकाशन करना भाषाई समावेशिता की दिशा में एक 'मील का पत्थर' है।
सिंधी भाषा: प्राचीनता और मधुरता का मेल
सिंधी भाषा दिवस के अवसर पर बधाई देते हुए उपराष्ट्रपति ने इस प्राचीन भाषा की जमकर प्रशंसा की। उन्होंने कहा:
- साहित्यिक विरासत: सिंधी भाषा की परंपरा वेदांत दर्शन और सूफी विचारधारा का एक अद्भुत मिश्रण है।
- सामाजिक मूल्य: यह भाषा सदियों से एकता, प्रेम और आपसी भाईचारे के संदेश को प्रसारित करती आई है।
"संविधान राष्ट्र की जीवंत आत्मा है"
उपराष्ट्रपति ने अपने संबोधन में जोर दिया कि भारत का संविधान केवल एक कानूनी किताब नहीं, बल्कि राष्ट्र की जीवंत आत्मा है। उन्होंने सरकार के उन प्रयासों की भी सराहना की जिसके तहत संविधान को देश की विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध कराया जा रहा है।
संविधान अब इन भाषाओं में भी है उपलब्ध:
सिंधी के अलावा, भारत का संविधान अब बोडो, डोगरी, संथाली, तमिल, गुजराती और नेपाली जैसी कई भाषाओं में अनुवादित किया जा चुका है। इसका मुख्य उद्देश्य हर नागरिक को उसकी अपनी भाषा में संवैधानिक अधिकारों और कर्तव्यों से परिचित कराना है।

