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वरुथिनी एकादशी 2026: सोमवार को वैशाख की पहली एकादशी, अक्षय पुण्य के लिए करें इन विशेष चीजों का दान

Monday, 13 April 2026 | April 13, 2026 IST Last Updated 2026-04-12T23:12:12Z


धार्मिक महत्व: वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को वरुथिनी एकादशी के रूप में मनाया जाता है। वर्ष 2026 में यह पावन तिथि सोमवार, 13 अप्रैल को पड़ रही है। शास्त्रों के अनुसार, इस दिन व्रत रखने और श्रीहरि विष्णु की आराधना करने से न केवल पापों का नाश होता है, बल्कि अक्षय पुण्य की भी प्राप्ति होती है।

पूजन की विशेष विधि और अभिषेक
ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, वरुथिनी एकादशी पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का संयुक्त पूजन अत्यंत फलदायी होता है।
  • शंख अभिषेक: इस दिन दक्षिणावर्ती शंख में केसर मिश्रित दूध या जल भरकर भगवान का अभिषेक करना चाहिए।
  • श्रृंगार और भोग: प्रभु को पीले या लाल चमकीले वस्त्र अर्पित करें। चंदन और हल्दी का तिलक लगाएं।
  • तुलसी का महत्व: भगवान विष्णु को केले, गुड़ और मिठाई का भोग लगाएं, लेकिन ध्यान रहे कि भोग में तुलसी दल अवश्य हो, क्योंकि इसके बिना श्रीहरि भोग स्वीकार नहीं करते।
  • मंत्र जाप: पूजा के दौरान 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का निरंतर जाप करना श्रेष्ठ माना जाता है।
कैसे रखें वरुथिनी एकादशी का व्रत?
इस व्रत के नियम दशमी तिथि की संध्या से ही शुरू हो जाते हैं:
  • दशमी (12 अप्रैल): सात्विक भोजन ग्रहण करें और ब्रह्मचर्य का पालन करें।
  • एकादशी (13 अप्रैल): सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें और व्रत का संकल्प लें। दिनभर निराहार रहें। यदि संभव न हो, तो फलाहार (दूध, फल या जूस) लिया जा सकता है।
  • द्वादशी (14 अप्रैल): अगले दिन सुबह पूजा के बाद किसी जरूरतमंद को भोजन कराएं और स्वयं पारण (भोजन) करके व्रत खोलें।
दान का विशेष महत्व: गर्मी से जुड़ी वस्तुओं का करें दान
एकादशी पर दान करने से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और जीवन में सकारात्मकता आती है। वैशाख मास में गर्मी की शुरुआत हो जाती है, इसलिए इस समय निम्नलिखित चीजों का दान करना सर्वश्रेष्ठ बताया गया है:
  • शीतलता प्रदान करने वाली वस्तुएं: पानी से भरा मटका, छाता, मखमल के जूते-चप्पल।
  • अन्न और सामग्री: अन्न, तिल, हल्दी, भोजन और क्षमतानुसार धन का दान।
शास्त्रों की दृष्टि में एकादशी
स्कंद पुराण के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं पांडवों को एकादशी व्रत की महिमा बताई थी। यह व्रत न केवल भौतिक इच्छाओं की पूर्ति करता है, बल्कि मन, वचन और कर्म की शुद्धि का सबसे बड़ा माध्यम है।

नोट : यहाँ प्रस्तुत जानकारी धार्मिक मान्यताओं और लोक परंपराओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल सूचना प्रदान करना है, इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

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