धार: मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला-कमल मौला मस्जिद मामले में इंदौर हाईकोर्ट में सुनवाई का दौर जारी है। 'हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस' की ओर से वकील विष्णु शंकर जैन ने अपनी बहस पूरी करते हुए एएसआई (ASI) की सर्वे रिपोर्ट के आधार पर कई बड़े दावे किए हैं।
"सरस्वती मंदिर के अवशेषों से बना है ढांचा"
सुनवाई के दौरान जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और आलोक अवस्थी की पीठ के सामने हिंदू पक्ष ने तर्क दिया कि:
- वर्तमान संरचना का निर्माण 11वीं-12वीं शताब्दी में परमार वंश द्वारा निर्मित सरस्वती मंदिर और संस्कृत विद्यालय को तोड़कर किया गया था।
- एएसआई की 1903 और 1972-73 की रिपोर्ट भी पुष्टि करती हैं कि यहाँ एक प्राचीन हिंदू धार्मिक ढांचा मौजूद था।
- 14वीं शताब्दी के बाद मुस्लिम आक्रमणकारियों ने इस मंदिर को नुकसान पहुँचाया और इसके मलबे का उपयोग किया।
नक्काशी और वास्तुकला को बनाया आधार
विष्णु शंकर जैन ने कोर्ट में दलील दी कि भोजशाला के पिलरों और दीवारों पर जो कलाकृति है, वह इस्लामी वास्तुकला का हिस्सा नहीं हो सकती:
- देवी-देवताओं की आकृतियां: यहाँ के खंभों पर भगवान गणेश, ब्रह्मा, नरसिंह और भैरव की छवियां मिली हैं।
- जीव-जंतुओं के चित्र: दीवारों पर हाथी, शेर, कछुए, हंस और घोड़ों की आकृतियां उकेरी गई हैं।
- इस्लामी परंपरा का तर्क: हिंदू पक्ष ने कहा कि इस्लाम में मस्जिदों के भीतर मनुष्य या पशुओं की आकृतियां बनाना वर्जित है। कई स्थानों पर इन छवियों को छेनी से काटकर मिटाने की कोशिश की गई है, जो मंदिर होने का ठोस प्रमाण है।
लॉर्ड कर्जन की रिपोर्ट का उल्लेख
हिंदू पक्ष ने इतिहास का हवाला देते हुए बताया कि साल 1904 में तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कर्जन ने भी अपनी वार्षिक रिपोर्ट में इस स्थान की पहचान एक मंदिर के रूप में की थी। वहां मौजूद 100 से अधिक नक्काशीदार खंभे मूल रूप से मंदिर का ही हिस्सा थे।
पूजा के अधिकार की मांग
हिंदू संगठन ने 'प्राचीन स्मारक संरक्षण अधिनियम, 1904' का हवाला देते हुए कोर्ट से अपील की है कि:
"चूंकि यह स्थान मूल रूप से एक मंदिर है और इसके कण-कण में हिंदू संस्कृति की वास्तुकला मौजूद है, इसलिए हिंदुओं को यहाँ पूरे साल पूजा-अर्चना करने का संवैधानिक अधिकार दिया जाना चाहिए।"
